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मध्यप्रदेश में आदिवासी चित्रकला

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मध्यप्रदेश में आदिवासी चित्रकला

चित्रकला ने जनजीवन को बहुरूपी  संवेदना को जब रंगों से स्पर्श मिलता है, तो उसमें कल्पना की उड़ान  भर जाती है और वह कैनवास पर उकेरा जाता है जो चित्रकला को जन्म देता है, मध्यप्रदेश की माटी में चित्रकला का परीक्षण एवं संवर्धन मानव सभ्यता के साथ ही आरंभ हो जाता हुआ है। भीम बैठका में भी चित्रो से प्रारंभ होने वाली तुलिक कला यात्रा बाघ की गुफाओं के चित्रों से होती हुई आधुनिक रंगीन कौशल को बिखेरती है ।

  • प्रदेश के राजमहलो, मंदिरों, खजुराहो, मांडू, ग्वालियर, इंदौर आदि स्थानों मैं चित्रकला का इतिहास उकेरा गया है। संस्कृति की विभिन्नता वाले मध्यप्रदेश में एक विस्तृत क्षेत्र आदिवासी अंचलों का है।
  • पौराणिक सामाजिक कथा एवं परंपराओं का रंग  वास्तव में आदिवासी चित्रकला में ही दिखाई देता है भोपाल स्थित सांस्कृतिक गतिविधि के केंद्र भारत भवन में भी चित्रकला के संवर्धन में महत्व भूमिका निभाई है।
  • वर्तमान में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा भोपाल में जनजातीय संग्रहालय में इनकी कलाओं को रहन-सहन को दर्शाया गया है आज भी आदिवासी अपने पुराने रूप में ही जीवन यापन करते हैं उनकी कला उनके जीवन जीने का तरीका आधुनिकता की ओर अभी भी बहुत कम है।
  • ऐसा माना जाता है कि आदिवासियों के मस्तिष्क  पटल पर सदियों पुरानी लोक चित्रकला संचित होती हैं इस कला को भले ही वह किसी पुस्तक में लिपिबद्ध कार्य करें या ना करें लेकिन अपने जीवन को उत्सव के रूप में लेने वाले की आदिवासी चित्रकारी पर इसका आनंद जरूर लेते हैं मध्यप्रदेश एक आदिवासी या मध्य प्रदेश में भारत की सबसे अधिक आदिवासी मध्यप्रदेश में निवास करते हैं। आइए जानते हैं कि मध्यप्रदेश जनजातियों द्वारा कौन-कौन सी चित्रकला की जाती है ।

गौड़ चित्रकला

  • यह मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा ,मंडला जिले एवं नर्मदा केंद्र के आसपास बसे गौड़ जनजाति द्वारा घर के द्वार और दीवारों पर चित्रकारी की जाती है इस जनजाति द्वारा की जाने वाली चित्रकला में आदिम कला का विस्तार छिपा हुआ है।
  • चित्रकला में उनकी कल्पना शीलता स्पष्ट रूप से प्रकट होती है प्रकृति के साथ-साथ यह विभिन्न प्रकार की रंगों का भी प्रयोग करते हैं। नर्मदा किनारे बसे रंगों का उपयोग करने में अपनी अलग विशेषता को रखते हैं।
  • यह अपने चित्रों में पशु-पक्षियों को भी प्रमुख स्थान देते हैं।

बैगा चित्रकला

  • बैगा चित्रकला में देवी-देवता, पशु-पक्षी ,नदी ,पहाड़, पेड़-पौधे आदि के चित्रों द्वारा चित्रकला की जाती है।
  • इस चित्रकला की अपनी एक अलग विशेषता है, यह भी प्रकृति एवं धर्म दोनों की कल्पनाशीलता का समावेश के साथ-साथ रंगों की सहायता से उकेरी जाती है।

कुक्षी का छिपा शिल्प

  • मध्य प्रदेश के धार जिले के एक कस्बा कुक्षी में  छिपा शिल्प का कार्य किया जाता है।
  • जो वस्त्रों पर उकेरे जाते हैं यह कार्य भील जनजाति द्वारा किया जाता है, अब छिपा कला को राष्ट्रीय स्तर पर नवाजा गया है।

पिथोरा भित्ति चित्र

  • यह झाबुआ जिले की मुख्य चित्रकारी है इसमें घोड़े के चित्र का अंकन विशेष रूप से किया जाता है यह कला भी भील आदिवासियों द्वारा की जाती है। इस कला के प्रमुख चित्रकार प्रेमा भील प्रमुख माना जाता है।

लोक चित्रकला मांडणा

  • संकेत व प्रतीकों के रूप में अंकन करना  मांडणा कहलाता है। इसे भूमि की चित्रकारी कहते हैं भारतीय संस्कृति में त्योहारों खुशी के मौके के अवसर पर गोबर से भूमि पर लिपाई की जाती है।
  • मांडणा का शाब्दिक अर्थ होता है बनाना यह एक पारंपरिक लोक कला है इस कला को महिलाएं अपने आंगन में इसमें चावल के आटे, ज्वार के आटे ,हल्दी कुमकुम, गैरों, खड़िया पत्थर ,सफेद चूना मिट्टी के रंग आदि का प्रयोग किया जाता है ।
  • इस समय फूल-पत्ती, बेल, पशु-पक्षी आदि को प्रतीक के रूप में बनाया जाता है। इसमें ज्यामिति आकृतियां त्रिभुज, चतुर्भुज, आड़ी-खड़ी रेखाएं व्रत भी बनाए जाते हैं ।
  • इस लोक कला का प्रचलन लगभग संपूर्ण मध्यप्रदेश में देखने को मिलता है इसमें सृष्टि के विस्तार को दर्शाया जाता है इसमें कमल की आकृति बनाकर सृष्टि की उत्पत्ति को व्यक्त किया जाता है यह कला हाथ और उंगलियों से इसको उकेरा जाता है, इसके साथ उंगलियां और अंगूठे के बीच रंग भिगोए गए कपड़े अथवा रुई से इसे सजाया जाता है।
  • भूमि अलंकरण की यह विधा आज की नहीं वैदिक काल से चली आ रही है ।इसे कर्मकांड व  पूजा के प्रतीक से भी से भी जोड़ा जाता है।

बाघ प्रिंट

  • बाघ प्रिंट मध्य प्रदेश के धार जिले के विकासखंड की वस्त्र प्रिंट कला है। यहां पर एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है जो बाघ की गुफाएं भी प्राप्त हुई है।
  • यह प्राचीन काल से भित्ति चित्रों के लिए विश्व प्रसिद्ध है माना जाता है बाघ प्रिंट के दशको के पहले से अलि जरीन के नाम से जाना जाता था।
  • जिसका अर्थ था आल की जड़ यह ठप्पा छपाई के नाम से भी जाना जाता है इस में परंपरागत रंगों का प्रयोग किया जाता है वह प्रिंट में साड़ी, घाघरा, पगड़ी ,लुगडा चोली आदि बनाए जाते हैं  बाघ प्रिंट अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाना इससे इससे अर्जेंटीना की एक निर्माण कंपनी रेपसोडिया ने सिल्क पर बाघ प्रिंट बनाने का प्रस्ताव दिया था।
  • बाघ प्रिंट शिल्पी इस्माइल सुलेमान जी खली इस विधा में परंपरागत नाम है उनकी इस कला के लिए सुलेमान जी को यूनेस्को ने पुरस्कृत किया है।

निमाड़ लोक चित्रकला

निमाड़ अंचल में लोक चित्रकला परंपरा आदि काल से चली आ रही है यहां पर दीवारों पर कुछ ना कुछ बनाया जाता है । यही लोक चित्र परंपरा है ।

  • जीरोती-हरियाली अमावस्या पर।
  • नाग भित्ति चित्र – नाग पंचमी पर।
  • साजाफूली -कुँआर माह में नवरात्रि में दशहरे का चित्रण- दशहरे के दिन थापा(हाथ) शैली- सेली सप्तमी पर गोरधन -दीपावली पड़वा पर।
  • भित्ति चित्र – दीपावली पर भाई दूज पर लक्ष्मी जी ,गणपति जी व सरस्वती का रेखांकन दीपावली के दिन व्यापारियों द्वारा हल्दी कुमकुम से।
  • झोपड़ी पूजन – यह देव प्रबोधनी ग्यारस पर गन्नो को खड़ा कर झोपड़ी बनाते हैं।
  • ईरत भित्ति चित्र – विवाह में कुलदेवी पूजा में।
  • साती – दरवाजे पर।
  • गणपति पाना – मुख्य द्वार पर।
  • कंचाली भरना – दूल्हा दुल्हन के मस्तक पर।
  • पगल्या – पहले शिशु के जन्म पर शुभ संकेत।

मालवा की लोक चित्रकला

मध्य प्रदेश के लगभग हर क्षेत्र में लोक चित्रकला का अपना एक अलग महत्व है, मालवा में दो तरह के लोग चित्र परंपरा है एक भित्ति चित्र दूसरा भूमि अलंकरण।

  • भित्ति चित्र के उदाहरण –दिवासा, नाग ,भेरूजी, सरवण जन्माष्टमी, संजा, मायमाता।
  • भूमि अलंकरण के उदाहरण चितेरे मंगल, कलश, मुख्य द्वार सज्जा ,कलश ढुलाती महिलाएं ,बग्गी में दूल्हा-दुल्हन, हाथी पर दूल्हा-दुल्हन, बारात बैंड वाले ,घुड़सवार पालकी, बेल -बूटे, पशु -पक्षी, गणेश, शंकर ,पार्वती, देवी- देवता आदि।

बुंदेली लोक चित्र परंपरा

बुंदेलखंड अपनी एक अलग पहचान के रूप में जाना जाता है, बुंदेली लोक चित्र अपनी अलग पहचान रखते हैं बुंदेलखंड में हर त्योहार का पर्व पर अलग-अलग चित्र बनाने की परिपाटी है ।

  • सुरेती – बुंदेलखंड का भित्ति चित्रण है यह दिवाली पर लक्ष्मी पूजा के समय बनाया जाता है, सुरेती लोकप्रिय कला की दृष्टि से बुंदेलखंड का सर्वश्रेष्ठ प्रतीकात्मक चित्र है ।
  • नौरता  – नवरात्रि में कुंवारी कन्याओं द्वारा।
  • मोरते – विवाह के समय भित्ति रेखांकन।
  • गोधन गोवर्धन – दीपावली की पड़वा पर
  • मौरइला – मौरइला का अर्थ मोर का चित्र से है इससे मोर मोरेला भी कहते हैं यह एक वित्तीय अलंकरण है ।
  • नाग भित्ति चित्र – नाग चित्र नाग पंचमी के दिन ( बघेलखंड में भी बनाया जाता है)

This article is compiled by Supriya Kudraya.

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