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मध्यप्रदेश लोक कलाएं व रुपंकर कलाएं

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मध्यप्रदेश लोक कलाएं व रुपंकर कलाएं

शिल्प कला में परंपरागत रूप से काम करने वाले लोगो की एक ही समाज में बहुत पहले से जातिगत पहचान बन गई थी जैसे मिट्टी का काम करने वालों को कुम्हार, लोहे का काम करने वालों को लोहार ,ताबे के काम करने वालों को ताम्रकार ,काष्ट के काम करने वालों को वाला सुतार व स्वर्ण के काम करने वालों को स्वर्णकार कहा जाता था आदि।कलाकार हमारी संस्कृति की धरोहर है सिर्फ विधाओं के संरक्षण और सौंदर्य में कई जातियों की पूरा प्रतीक स्मृतियों को सहज रूप से देखने को मिलती है आइए हम जानते हैं कि मैं तो प्रदेश की परंपरागत शिल्प कौन कौन से हैं।

1.  मिट्टी शिल्प

  • मिट्टी शिल्प आदि काल से चल रहा शिल्प है, जिससे मनुष्य ने सबसे पहले बर्तन बनाएं ।
  • पृथ्वी के निर्माण के साथ ही मिट्टी शिल्प का आरंभ होता है।
  • मिट्टी के खिलौने मूर्तियां बनाने की कला सबसे प्राचीन परंपरा है मिट्टी के कार्य करने वालों को कुमार कहते हैं।
  • लोक व आदिवासी दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली वस्तुओं के साथ कलात्मक रूपंकालाओ का भी निर्माण करते हैं।
  • भारत के विभिन्न अंचलों में मिट्टी शिल्पकारों की ख्याति सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी पहुंचती है ।
  • मध्यप्रदेश में बस्तर शिल्पीओ द्वारा अत्यंत सुंदर कलाओ का अलंकरण कार्य किए जाते हैं।
  • इस कारण मिट्टी शिल्प सबसे अलग पहचान ले जाते हैं झाबुआ, मंडला, बैतूल आदि सिर्फ अपनी अपनी निजी विशेषताओं के लिए जाने जाते हैं।
  • मिट्टी शिल्प कला का वैभव पर्व- त्योहारों पर देखा जा सकता है ।

2. काष्ठ शिल्प

  • काष्ठ शिल्पी की परंपरा भी प्राचीन मानी जाती है, और यह एक समृद्ध परंपरा रही लकड़ी के विभिन्न रूपोंकारों को मनुष्य ने आदिम युग से जब मानव ने जंगलों से मकानों में रहने सीखा तो काष्ठ शिल्प को एक श्रेष्ठ नमूने के रूप में देखा गया।
  • गाड़ी के पहियों ,देवी देवताओं की मूर्तियों ,घरों के दरवाजों , मुखोटे आदि वस्तु पर काष्ठ कला का उत्कृष्ट प्राचीन समय से देखने को मिलता है।

3. खराद कला

मध्यप्रदेश में लकड़ी को सुडौल कर देने की कला अति प्राचीन है, खिलौनों की सजावट सामग्री तैयार करने की अनंत संभावनाएं होती हैं।

  • खराद कलाकार परंपरागत होते हैं, यह शिवपुर, बुधनीघाट, रीवा ,मुरैना मैं देखने को मिलते हैं।
  • लकड़ी पर चढ़ाए जाने वाले रंगों का निर्माण का ठेठ रूप इनकी कला में आज भी मौजूद है खराद, सागवान, दूधी ,कदम, सलई, गुलशन खैर आदि की लकड़ी पर की जाती है। लाख, चपडी , राजन बेरजा ,खैर व जिंक पाउडर से रंग बनाए जाते हैं । केवड़े के पत्ते से रंगों में चमक पैदा की जाती है ।
  • श्योपुरकला ,रीवा और बुधनीघाट खराद कला का पारंपरिक केंद्र माना जाता है।

4. कंघी कला

  • संपूर्ण भारत में ग्रामीण समाज आमतौर पर आदिवासी समाज में अनेक प्रकार की कंघीयो का प्राचीन काल से ही प्रचलन रहा है। •आदिवासियों में कंघीयों का इतना महत्व है कि इनका अलंकरण गोदना भित्ति चित्रों में एक अभिप्राय के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुकी है।
  • इन कंघीयो की घड़ाई में सुंदर काम के साथ-साथ रत्न की जड़ाई मीनाकारी और अनेक अभिप्राय द्वारा उनका अलंकरण किया जाता है। •मालवा में कंघी बनाने का कार्य उज्जैन ,रतलाम, नीमच में होता है।
  • कंघी बनाने का श्रेय बंजारा जाति को जाता है।

5. तीर धनुष कला

  • वन्य जातियों में तीर धनुष परंपरा काफी प्राचीन है, तीर धनुष बाण, मोर पंख ,लकड़ी, रस्सी आदि से बनाये जाते हैं।
  • इनका प्रयोग भील जनजातियों के द्वारा शिकार के लिए किया जाता था।
  • भील, पहाड़ी कोरबा, कमार आदि तीर धनुष चलाने में कुशल माने जाते हैं, तीर धनुष भील आदिवासियों की पहचान के रूप में जाना जाता है। •प्रत्येक भील धनुष बाण अपने साथ ही रखता है
  • भील तीर चलाने में निपुर्णऔर निशाना इनका अचूक होता है ।सबसे बड़ी बात यह है कि यह आदिवासी तीर कमान अपने साथ ही रखते हैं।

6. बांस शिल्प

  • बांस से बनी कलात्मक वस्तुएं सौंदर्य और जीवन उपयोगी होती हैं, इसकी शिल्प की महत्ता जीवन में बढ़ती जा रही है।
  • बस्तर, झाबुआ, मंडला आदि जिलों में जनजातियों द्वारा दैनिक जीवन में उपयोग आने वाली कलात्मक चीजों का स्वयं अपने हाथों से निर्माण करते हैं बांस का निर्माण करने वाली कई जातियों सिद्धहस्त कलाकार हैं ।
  • यह कला झाबुआ ,मंडला की परंपरागत परंपरागत कला है।

7. पत्ता शिल्प

  • पता शिल्प कलाकार मूलतः झाड़ू बनाने वाले को माना जाता है।
  • यह पेड़ पौधों में विभिन्न आकारों में मिलने वाले पत्तों के प्रति मनुष्य का मन आदि काल से आकर्षित रहा है इन पत्तों के कला के आयाम ढूंढ लिए हैं पेड़ पत्तों में कलात्मक खिलौने, चटाई ,आसन ,दूल्हा- दुल्हन मोढ़ आदि बनाए जाते हैं।
  • पत्तों के अनुरूप उनमें विभिन्न कालाभिप्रयो को बनने में अनेक जातियों और जनजातियों की पारंपरिक कला आज भी विद्यमान है।
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 8. कठपुतली

  • ऐतिहासिक घटनाओं और नाटकीय अंदाज में व्यक्त करने में मनोरंजन की विधा का कटपुतला है, जिसमें मानीवीय विचारों और भावों को अभिव्यक्त किया जाता है।
  • कठपुतली के प्रसिद्ध पात्र अनारकली, बीरबल ,बादशाह अकबर ,पुंगी वाला ,घुड़सवार ,सूत्र संबंधी पुतली और छाया बनाए जाते हैं ।
  • भारत में पुतली का ऐतिहासिक में नाटकों में प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध है।
  • कठपुतलियां कठिन से कठिन मानवीय स्थितियों को प्रस्तुत करने में समर्थ होती है।
  • कठपुतली की चार प्रकार की शैलियां है दस्ताना पुतली ,धड़ पुतली, सूत्र संबंधी पुतली और छाया पुतली यह अपने ऐतिहासिक स्थानों को कलात्मक धन से गांव-गांव में प्रस्तुत करते हैं जिन्हें वे कठपुतली का खेल कहते हैं।

 9. गुड़िया शिल्प

  • नई और पुरानी रंगीन चिंदियों ओर कागजों से गुड़िया बनाने की लोक परंपरा देखने को मिलती है।
  • खिलौनो में गुड़िया प्रथा बहुत पुरानी है यह पर्व त्योहारों इन्हें मांगलिक अनुष्ठानों मैं भी प्रयोग किया जाता है।
  • ग्वालियर अंचल में कपड़े लकड़ी और कागज से बनाई जाने वाली कुड़ियों की परंपरा अनुष्ठान है, यहां पर इनका ब्याह रचा जाता है वह व्रततो पर इनकी पूजा की जाती है।
  • यहां पर साज-सज्जा, वेशभूषा, चेहरे की बनावट गुड़िया बनाने का आकार बहुत प्रसिद्ध है ।
  • झाबुआ भीली गुड़िया का केंद्र बन गया है, भीलो द्वारा भी स्थानीय में भी गुड़िया बनायी जाती है देश और प्रदेश में प्रसिद्ध है।
  • झाबुआ की गुड़िया राज्य स्तर पर प्रशंसा पुरस्कार प्राप्त कर चुकी है।

10.  छीपा शिल्प

  • कपड़े पर हाथ से बनाए जाने वाला छीपा शिल्प विभिन्न छापों को उकेरा जाता है, यह भील जनजाति वासियों की विभिन्न प्रांतों का प्रतीकों का समावेश है आज भी अधिकांश भील आदिवासी इन्हीं वस्तुओं का उपयोग करते हैं।
  • पिछले कुछ वर्षों में छिपा शिल्प कला ने उद्योग का रूप ले लिया है बाघ, कुक्षी, मनावर ,गोगांव, खिराला उज्जैन छीपा शिल्प के पारंपारिक केंद्र माने जाते हैं।
  • उज्जैन का छिपा शिल्प भैरव गढ़ के नाम से देश तथा विदेश में विख्यात है। कई कलाकारों को प्रदेश स्तर पर और राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिल चुके हैं ।

11. महेश्वरी सिल्क

  • साड़ी महेश्वरी साड़ियां अपनी बनावट और साज-सज्जा रंग और कलात्मकता के लिए भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी सराही जाती हैं।
  • महेश्वर के पारंपरिक बुनकर द्वारा यह बुनी जाती है, सूती और रेशमी साड़ियां सुंदर टिकाऊ और पक्के रंग की होती हैं जिन पर जरी और केले के धागों से छोटे छोटे बेल -बूटे कड़े जाते है।
  • महेश्वरी साड़ी की प्रमुख विशेषता यह होती है कि चोखाना-चौकड़ी, कलात्मक किनार ,मनमोहक पल्लू, हल्के गहरी चमकदार चांदी और स्वर्णिम रंगों में जरी रेशम से हथकरघा की कढ़ाई भी की जाती है।
  • माहेश्वरी साड़ी उद्योग कला को स्थापित करने का श्रेय रानी अहिल्याबाई को दिया जाता है।
  • महेश्वरी साड़ी पूर्णता देशी वस्त्र कला की देन है यह कला महेश्वर में जन्मी ,पाली और विस्तारित भी यहीं से हुई ।

11. चंदेरी साड़ी

  •  चंदेरी में बनाने के कारण इसका नाम चंदेरी साड़ी पड़ा चंदेरी साड़ी रेशमी और सूती दोनों तरह की बनाई जाती है।
  • साड़ी में सूती और रेशमी छोटे-छोटे बूटे डाले जाते हैं, चंदेरी साड़ी की विशेषता यही होती है कि वह हल्के और गहरे रंग कलात्मक चौड़े बॉर्डर तथा साड़ी की बनावट प्राय: सादी होती है, लेकिन उसके पल्लू पर विभिन्न रंगीन धागों से संयोजित बड़े आकार से बेल- बूटे, मो,र बदक आदि की आकृतियां काड़ी जाती है।
  • चंदेरी साड़ी की लोकप्रियता प्रदेश देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी विख्यात है।

12. भीली – चोमल, बटुआ, थैलिया, मोतीमाला

  • भीम या भिलाला महिलाएं दैनिक उपयोग के लिए सुंदर धूमल, बटुआ और थैलियां बनाती हैं।
  • धार , झाबुआ क्षेत्र में कलात्मक चोमल बटुआ अत्यधिक लोकप्रिय है, भीली महिलाएं उन्हें बनाने में पारंपरिक रूप से परंपरागत होती हैं।
  • भीली महिलाएं तरह-तरह की मालाएं पहनती हैं और उनको बनाने व पहनने की शौकीन भी होती है, यह महिलाएं मालाएं भी महिलाएं स्वयं बनाती हैं, भीली लड़कियां बचपन से ही खाना बनाना सीख जाती है या और इनमें मोती माला गूँथना इनकी प्रमुख विशेषता होती है, जिनमें यह सुंदर-सुंदर जालियों तथा फूलों के आकार बनाती हैं और छोटे-छोटे रंगीन तथा सफेद मोतियों की उपयोग करती हैं।

13. प्रस्तर शिल्प

  • मंदसौर और रतलाम जिले को इसका केंद्र माना जाता है जहां पर पत्थर को विभिन्न आकार देकर श्रेष्ठ परंपरागत रूप से कला की जाती है।
  • यह शिल्पकार गुजर ,गायरी, जाट भील आदि जातियों और जनजातियों के देवनारायण ,नागा बाबा जी,भैरू बाबा जी, रामदेव जी, शक्ति भैसासुर, माता, तेजाजी, गणपति जी दुर्गा हनुमान आदि हिंदू देवी देवताओं मूर्तियां बनाते हैं ।
  • भेड़ाघाट संगमरमर मूर्ति और ग्वालियर पौराणिक देव देवी देवताओं की मूर्ति बनाए जाने का केंद्र है ।

14. लाख शिल्प

  • वृक्षों के गोंद या रस से लाख बनाई जाती है, लाख को गर्म करके उसे विभिन्न रंग मिलाकर अलग-अलग आकार देकर चूड़ियां बनाई जाती है।
  • आजकल लाख में अनेक प्रकार का सामान बनाया जाने लगा है, लाख बनाने का कार्य लखार जनजाति द्वारा किया जाता है।
  • लखार जाति के स्त्री व पुरुष दोनों की पारंपरिक रूप से लाख कर्मकार में दक्ष होते हैं, इसमें यह चूड़े खिलौने, सिंगार पटेरी, डिबिया, लाख के अलंकृत पशु-पक्षी आदि कलात्मक वस्तुएं बनाते हैं ।
  • उज्जैन इंदौर रतलाम मंदसौर महेश्वर लाख शिल्प परंपरागत केंद्र माने जाते हैं।
This article is compiled by Supriya Kudraya.
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