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मध्यप्रदेश के प्रमुख जनजातीय व्यक्तित्व

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मध्य प्रदेश के प्रमुख जनजातीय व्यक्तित्व

Mppsc prelims unit 1 notes

मध्य प्रदेश मैं अनेक प्रकार की जनजातियां निवास करती हैं, जनसंख्या की दृष्टि से मध्यप्रदेश में भारत की सबसे अधिक जनजातियां निवास करती हैं प्राचीन काल से अब तक इनके महान व्यक्तित्व वाले व्यक्तियों को जानते हैं की मध्य प्रदेश मैं इनका भी एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

टंट्या भील (टंट्या मामा )

  • जन्म-1842
  • स्थान –पश्चिमी निमाड़ के बेरी गांव में।
  • वास्तविक नाम – टंट्या भील
  • अंग्रेजो के द्वारा दिया नाम या उपाधि- ‘इंडियन रॉबिनहुड‘।
  • टंट्या भील 1957 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मध्य प्रदेश के निमाड़ अंचल के भीलो को एकत्रित कर क्रांति में भाग लिया ,भीलो का नेतृत्व टंट्या भील द्वारा किया गया इसलिए इनका नाम अग्रणी है।
  • टंट्या भील ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भील आदिवासी जनता पर हो रहे अत्याचार शोषण भ्रष्टाचार उनके आधारभूत अधिकारों को रोकने के लिए भील समाज को एकत्रित कर दुशासन तथा अन्याय के प्रति अंग्रेजो के खिलाफ आवाज उठाने वाले टंट्या भील थे ।
  • टंट्या भील के साहसिक काम के कारण भील जनजाति के बहुत से लोग उनकी देवता मानकर पूजा करते हैं भीलो का मानना है कि टंट्या भील के पास अलौकिक शक्तियां थी।
  • यह न्यायप्रिय, शांतिप्रिय, संघर्षशील एवं अन्याय को सहन ना करने वाले व्यक्ति थे।
  • बचपन से ही टंट्या भील समर्पित, बलवान, संघर्षशील व्यक्तित्व के धनी थे।
  • उनमें संगठन को बनाने और चलाने की शक्तियां थी।
  • जब उन्होंने 1857 की क्रांति में भाग लिया था तब उनकी आयु मात्र 15 वर्ष की थी 19वीं शताब्दी में इन्होंने गोरिल्ला युद्ध पद्धति के द्वारा संघर्ष किया।
  • टंट्या भील को आदिवासियों आदिवासियों का नायक व निमाड़ का गौरव कहा जाता है।
  • अंग्रेजो के खिलाफ अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए अंग्रेजों द्वारा इन्हें 1 साल की सजा सुना कर जेल में बंद कर दिया गया ।
  • निमाड़ अंचल में होने वाली घटनाओं एवं क्रांतिकारी का गतिविधियों व अंग्रेजों के शासन में हस्तक्षेप करते थे इसलिए अंग्रेजों द्वारा इनकी पैतृक संपत्ति जमीन जाइजाद छीन ली गई।
  • इन्होंने कड़ी मेहनत कर अपना जीवन यापन किया ।
  • इन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 4 दिसंबर 1889 को फांसी की सजा सुना दी गई ।
  • इन के सम्मान में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा खेल एवं शिक्षा गतिविधियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले आदिवासी युवा जननायक टंट्या भील राज्य स्तरीय सम्मान प्रदान किया जाता है इस सम्मान मे 1 लाख की सम्मान निधि व प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया जाता है।
  • पहला सम्मान श्री राजाराम मौर्य को 2008 में दिया गया, जो देवास जिले के निवासी हैं।

भीमा नायक

  • जन्म 1840
  • जन्म स्थान -पश्चिमी निमाड़ रियासत के बड़वानी जिले के पंचमोहली ग्राम में।
  • उपाधि अंग्रेजों द्वारा -‘ निर्माण के रॉबिनहुड ‘।
  • भीमा नायक का संघर्ष भी आदिवासियों को छल-कपट व शोषण से बचाना था ।यह आदिवासियों को साहूकारों के चंगुल से छुड़ाने के लिए उनका धन लूटते थे और लोगों में बांट दिया करते थे।
  • मध्यप्रदेश में 1857 की क्रांति में आदिवासियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया इसमें भीमा नायक का नाम सर्वोपरि है।
  • तात्या टोपे से मिलने के बाद भीमा नायक के अंदर स्वतंत्रता संग्राम मैं शामिल होने की भावना का प्रसार हुआ, 1857 की क्रांति में उन्होंने बड़वानी जिले के सेंधवा नेतृत्व किया, जो बाद में खानदेश( वर्तमान बुरहानपुर)व  महाराष्ट तक प्रभावित रहा ।
  • 1857 की क्रांति मैं भीमा नायक के नेतृत्व में 3000 लोगों ने संघर्ष किया, जिसमें खाज्या नायक, दौलत सिंह, कालू बाबा आदि प्रमुख नेताओं ने भी भाग लिया, इन्होंने अंग्रेजों के कई ठिकानों को नष्ट कर दिया भीमा नायक ने तीर कमान टुकड़ी से अंग्रेजों को परास्त कर दिया यह बात अंग्रेजों को सहन नहीं हुई।
  • अंग्रेजों द्वारा इनकी मां को बंदी बना लिया गया और मंडलेश्वर दुर्ग में बंद कर रखा गया और उनको इतनी प्रताड़ना दी गई कि 15 दिनों में उन्होंने उन्होंने प्राण त्याग दिए।
  • 2 अप्रैल 1868 को सतपुड़ा के घने जंगलों में सोते समय भीमा नायक को अंग्रेजों के सिपाहियों द्वारा पकड़ लिया गया भीमा नायक को गिरफ्तार कर पोर्ट ब्लेयर भेज दिया गया।
  • इन्हें अंडमान के कालापानी में 19 दिसंबर 1876 को फांसी की सजा सुना दी गई।
  • इनकी धआवां बावड़ी गांव के पहाड़ पर एक गढी है। जो बड़वानी-सिलावद मार्ग पर स्थित है, जहां हाल मध्य प्रदेश सरकार द्वारा भीमा नायक के सम्मान में उसे स्मारक बनाया गया है।

खाज्या नायक

  • जन्म -1830
  • जन्म स्थान- निमाड़ के एक छोटे से ग्राम क्षेत्र सांगली ग्राम में।
  • पिता का नाम- कमान नायक (जो अंग्रेजों के चौकीदार थे)।
  • पुत्र का नाम -दौलत सिंह।
  • ब्रिटिश सरकार के एक खलनायक को एक दिन अचानक हत्या के मामले में बंदी बना लिया गया और उन्हें 40 साल की सजा सुनाई गई।
  • जेल में उनका आदर्श रहन-सहन देखकर उन्हें 5 साल में ही रिहा कर दिया गया ।
  • 1857 की क्रांति में इन्होंने अपने बहनोई भीमा नायक के साथ बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और एक पलटन बनाई।खाज्या नायक और भीमा नायक की जुगल जोड़ी 1857 की क्रांति का शंखनाद होते ही फिरंगीयों के खिलाफ राग छेड़ दिया।
  • भील एवं कंपनी फौज के बीच 11 अप्रैल 1858 अंबापानी का भीषण युद्ध हुआ था इस युद्ध में अनेक संख्या में भील स्त्री-पुरुष मारे गए। इसी युद्ध में इनका इकलौता पुत्र दौलत सिंह भी शामिल था।
  • खाज्या नायक ब्रिटिश सेना को चकमा देकर भाग निकले ब्रिटिश सरकार ने खाज्या नायक की लिए 1000 का इनाम भी घोषित किया। संजय नायक को कर्नल जेम्स ने वार्ता करने के लिए बुलाया और उन्हें छल से बंदी बना लिया गया ।इन्हें बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया।
  • मध्यप्रदेश शासन द्वारा 11 अप्रैल को खलनायक की स्मृति में शहीद दिवस के रुप में मनाया जाता है।
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रानी अवंती बाई

  • जन्म -16 अगस्त 1831
  • जन्म- स्थान सिवनी जिले के मनकेडी ग्राम
  • पिता का नाम – जुझार सिंह लोधी।
  • अवंती बाई बचपन से ही साहसी कन्या थी उन्हें तलवारबाजी और युद्ध का शौक था।
  • रानी अवंती बाई 17 वर्ष की आयु में रामगढ़ के राजा विक्रम सिंह के साथ विवाह हुआ ।
  • रानी के दो बेटे अमान सिंह एवं शेर सिंह को जन्म दिया था।
  • राजा विक्रमादित्य के स्वर्गवास के बाद राज पाठ रानी के द्वारा संभाला गया ।
  • रानी अवंती बाई ने मंडला राज्य को अंग्रेजों से मुक्त कराने का संकल्प भी किया ।
  • रानी अपनी सेना के साथ निकल पड़ी मंडला उस समय मंडला के डिप्टी कमिश्नर वालिंगटन रानी के बढ़ते प्रभाव को देख रानी के साथ युद्ध का ऐलान किया।
  • मंडला से दूर स्थित खेड़ी ग्राम में यह युद्ध हुआ रानी के प्रभाव को देख अंग्रेजी सेना के पैर उखड़ने लगे और डिप्टी कमिश्नर वालिंगटन भाग निकले ।
  • रानी की कृतज्ञता को बुलाकर वालिंगटन में दिसंबर 1857 को रामगढ़ पर चढ़ाई की और घेरा बंद कर लिया ।
  • रानी अवंती बाई ने छापामार युद्ध पद्धति से रामगढ़ राज्य से निकलकर देवहारगढ़ के जंगल की ओर चली गई देवहारगढ़ के जंगल में रानी की मुट्ठी भर सेना को अंग्रेजों ने परास्त कर दिया गया और सारी सेना मारी गई।
  • अंग्रेजों के हाथ न लगने की बजाय रानी ने स्वयं को तलवार से अपने वतन की रक्षा के खातिर बलिदान दिया।
  • इनकी सहयोगी का नाम गिरधारी बाई था।

झलकारी बाई

  • जन्म- झांसी के उत्तर पश्चिम दिशा में स्थित भोजला गांव मैं कोरी समाज में हुआ था।
  • पिता का नाम- मूलचंद्र।
  • माता का नाम- धनिया बाई।
  • झलकारी बाई वीरता ,शौर्य, निर्भयता व असहयोग के प्रति मधुर संवेदना पूर्ण हिर्दय का अनूठा संगम झलकारी बाई के हृदय में देखने को मिलता था ।
  • झलकारी बाई ने महारानी लक्ष्मी बाई की युद्ध में सहायता की थी।
  • झलकारी बाई जंगलों में पली-बढ़ी वही इन्होंने तलवार ,बरछी चलाना, घुड़सवारी करना आदि सीखा।
  • झलकारी बाई ने लक्ष्मीबाई को व उनके पुत्र को गुप्त मार्ग से सुरक्षित भेज कर पूरे दलबल के साथ घमासान लड़ाई लड़ी क्यूरोस ने दूल्हाजू की सहायता से झलकारी बाई को पकड़ लिया लेकिन वह भाग निकली।
  • स्वाभिमानी झलकारी बाई ने पेट में बरछी घोप कर अपने प्राणों की आहुति दे दी।

युवराज चैन सिंह

  • मध्य प्रदेश के प्रथम शहीद के रूप में जाना जाता है ।
  • कंपनी सरकार ने 1818 में सीहोर सैनिक छावनी की स्थापना की थी और पोलिटिकल एजेंट मैडाक के अधीन यह छावनी थी।
  • भोपाल के साथ-साथ नरसिंहगढ़ खिलचीपुर और राजगढ़ से संबंधी राजनैतिक अधिकार मैडाक को ही सौंपे गए थे।
  • 6 वर्ष के बाद सीहोर में अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह है भटक गया।
  • नरसिंहगढ़ रियासत के दीवान आनंदराम भक्ति को अंग्रेजों ने अपनी ओर मिला लिया जो नरसिंहगढ़ राज्य परिवार की गुप्त जानकारी अंग्रेजों तक पहुंचाता था नरसिंहगढ़ के राजकुमार कुंवर चैन सिंह ने विश्वासघात की जानकारी मिलते ही आनंदराम गद्दार को मौत के घाट उतार दिया ।
  • चैन सिंह ने मैडाल को आमने-सामने मिलने का देश भेजा।
  • मैडाल और चैन सिंह ने बैरसिया में मुलाकात की अंग्रेजों ने शर्त रखी कि अफीम की खरीदी सिर्फ अंग्रेज करेंगे।
  • कुंवर चैन सिंह 24 जून 1824 को सीहोर के दशहरा बाग मैदान में शहीद हुए।

धीरसिंह

  • जन्म- 1820
  • जन्म स्थान- रीवा के ग्राम कछिया टोला।
  • 17 वर्ष की आयु में रीवा के महाराज के साथ अनबन के कारण लाहौर चले गए और पंजाब के राजा रणजीत सिंह दरबार में नौकरी की।
  • रीवा के राजा ने इनके साथ सुलह कर इन्हें पुनः रीवा बुला लिया और महाराज ने अपना प्रमुख सहयोगी बनाया।
  • गढ़ मंडला के महाराज शंकर शाह से मिलने के पश्चात इन्होंने रीवा में 1857 की क्रांति का नेतृत्व किया ।
  • धीर सिंह बघेल रीवा राज्य से 1857 की क्रांति कारी के प्रमुख प्रमुख नेतृत्वकर्ता थे।

शंकर शाह

  • जन्म – 1783
  • जन्म स्थान – गढ़ मंडला
  • पिता का नाम – सुमेर शाह
  • 1857 की क्रांति के समय है शंकर शाह कंपनी में पेंशनर थे।
  • जबलपुर में स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत शंकर शाह के प्रयासों से हुई सर्वप्रथम यह है अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध खड़े हुए जिसका कारण 52वी रेजीमेंट का कमांडर ले जनरल क्लार्क ने संपूर्ण महाकौशल की जनता को परेशान कर रखा था।
  • 1857 की क्रांति में जबलपुर का नेतृत्व शंकर साहब ने किया इनकी स्थिति झांसी, कानपुर ,अवध तथा मेरठ की तरह ही थी।
  • खुशाल चंद्र नामक एक गद्दार जो सारी राजमहल की जानकारी अंग्रेजों तक पहुंचाता था ।
  • 11 जुलाई 1857 को असंतुष्ट सैनिक जमीदारों माल गुजारो बुद्धिजीवियों के साथ ही अंग्रेजों की 52वी पलटन को अपने साथ मिलाया और समूचे महाकौशल में क्रांति का प्रचार प्रचार प्रसार किया।
  • रघुनाथ शाह शंकर शाह के पुत्र बचपन से ही भैरव बाबा के मन्दिर जाया करते थे, और भैरव बाबा का मंदिर गोंडवाना के राजा संग्राम शाह के शासनकाल में बनवाया था।
  • शंकर शाह से 1857 की क्रांति का संचालन करते रहे और उन्हें और उनके पुत्र को 16 सितंबर 1857को बंदी बनाकर तोप से उड़ा दिया गया।

पेमा फल्या

  • जन्म – चंद्रशेखर आजाद नगर वर्तमान अलीराजपुर ।
  • प्रेमा पाल्या विश्व प्रसिद्ध चित्रकला ‘पिथौरा ‘ जो भील आदिवासी की विश्व प्रसिद्ध चित्र कला है, इसके सर्वश्रेष्ठ कलाकार पेमा फाल्या थे।
  • पिथौरा कला की एक मुख्य विशेषता यह है कि जिस ध्वनि को यह सुनते हैं, उसे आकृति रूप में प्रदर्शित किया जाता है।
  • भील आदिवासी समाज में पिथौरा सजावट के चित्र नहीं है यह एक धार्मिक अनुष्ठान है, जिसमें चित्रकार अपने मन से कोई भी रूपांकन नहीं करता वह प्रकृति और समृद्धि के देवों का आगमन है और यह अनुष्ठान उनको समर्पित छवियां हैं ।
  • घोड़ा पिथौरा के केंद्र में होता है।
  • जे स्वामीनाथन के द्वारा प्रेमा के पिथौरा शामिल रूप की पहचान कुछ इस तरह की है बाबा गणेश, चंदा बाबा, काठिया घोड़ा ,सूरज बाबा, जामी माता, आकाश ,ग्राम देवता, रानी काजल, हघराजा, कुमार मेघ, निगोड़ी ,नाहर हाथी, पानी वाली बावड़ी, सांप, बिच्छू ,बंदर ,भिश्ती, पोपट साथ ही चिन्नाला आदि ।
  • 1986 में प्रेमा पाल्या को प्रदेश सरकार द्वारा शिखर सम्मान से नवाजा गया मध्यप्रदेश शासन एवं सांस्कृतिक विभाग द्वारा आदिवासी लोक एवं पारंपरिक कलाओं के क्षेत्र में इन्हें वार्षिक तुलसी सम्मान से भी भोपाल के जनजातीय संग्रहालय में सम्मानित किया गया।

लाल पदमधर सिंह

  • जन्म -सतना जिले के कृपालपुर ग्राम में ।
  • 13 अगस्त 1942 को प्रारंभ हुए भारत छोड़ो आंदोलन में इन्होंने भाग लिया ।
  • इन्होंने भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में रीवा राज्य के आदिवासियों का नेतृत्व किया।
  • यह गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित थे एवं इन्होंने रीवा राज्य के प्रमुख नेता के रूप में जाने जाते हैं ।
  • 13 अगस्त 1842 को इन्होंने विद्यार्थी यूनियन बनाकर जुलूस निकाला इन पर इन पर अंग्रेजों द्वारा गोलियां चलाई गई जिसमें लाल पदमधर सिंह नेतृत्व करते हुए राष्ट्रीय ध्वज हाथ में लिए हुए गोली लगने से शाहिद हो गए।

बिरसा गोंड

  • 19 अगस्त 1942 बैतूल जिले की घोड़ाडोंगरी क्षेत्र में क्रांतिकारियों का नेतृत्व बिरसा गोंड ने रेलवे स्टेशन पर आदिवासी समूह के साथ रेल की पटरियां उखाड़ कर व पुलिस स्टेशन में आग लगाकर किया ।
  • मध्यप्रदेश की नर्मदा घाटी क्षेत्र में स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा के रूप में ले जाने वाले क्रांतिकारी आदिवासी नेता के रूप में जाना जाता है ।
  • इन पर पुलिस व वन अधिकारियों द्वारा बिना चेतावनी की गोली चलाकर इनकी हत्या कर दी गई।

जंगगढ़ सिंह श्याम

  • जन्म- 1962
  • जन्म स्थान – मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले के पाटनगढ़ गांव पारदगोंड परिवार में।
  • मृत्यु 2001 में
  • जापान के टोकामाची में, मिथिला संग्रहालय में, कला संग्रहालय, भारत भवन के निर्देशक जगदीश स्वामीनाथन के अनुग्रह पर भोपाल में पेशेवर कला के रूप में इन्होंने अपनी कला को सराहा
  • भारतीय कला के स्कूल ‘जंगल कलाम ‘के निर्माता के रूप में जाने जाते हैं ।
  • फरवरी में 1982 भारत भवन कि उद्घाटन प्रदर्शनी मे इन्होंने सर्वप्रथम जंगगढ़ के चित्रों को प्रदर्शित किया गया।
  • 1986 में जंगगढ़ को शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया।
  • इन्होंने जंगगढ़ चित्रकला सर्वप्रथम कैनवास पर निखारा यह कला ही जंगलकलाम कहलायी।
  • जंगल के चित्रों में प्राथमिक विषय पर गोंड देवता रहते हैं, साथ ही उन्होंने जानवर की शैली से चित्र बाघ, हिरण कछुए आदि का चित्रण किया अपने चित्रों में नए पैटर्न बनाने के लिए रंगीन लाइनों का प्रयोग किया।
  • मध्यप्रदेश की विधानसभा और भोपाल के भारत भवन के गुम्बद को भी जंगल श्याम द्वारा ही चित्रित किया गया जो आदिवासी और समकालीन भारतीय कला के प्रतिष्ठित संग्रहालय में से एक है।

जमुना देवी

  • जन्म 19 नवंबर 1929
  • जन्म स्थान- सरदारपुर धार।
  • शिक्षा -कैनेडियन स्कूल इंदौर।
  • मृत्यु 24 सितंबर 2010 ,इंदौर।
  • उपनाम- बुआजी के नाम से प्रसिद्ध।
  • स्वतंत्रता के पश्चात जमुना देवी पहली विधानसभा 1952 से 1957 तक विधानसभा सदस्य रही, बाद में यह मध्यप्रदेश के झाबुआ क्षेत्र से 6 बार चुनाव जीतकर विधायक बनी।
  • 1998 में मध्य प्रदेश की पहली महिला उपमुख्यमंत्री2003 में पहली महिला नेता प्रतिपक्ष के रूप में चुना गया।
  • 1962 में इन्होंने झाबुआ से पहली बार लोकसभा क्षेत्र में चुनाव जीती।
  • 1978 से 1981 तक इन्हें राज्यसभा सदस्य के रूप में चुना गया।
  • इन्होंने मध्य प्रदेश शासन के राज्य मंत्री कैबिनेट मंत्री आदिम जाति मंत्री अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़ा वर्ग कल्याण जैसे विभागों का दायित्व इनके द्वारा संभाला गया।
  • इन्हें 2001 में भारत ज्योति सम्मान से सम्मानित किया गया।

फग्गन सिंह कुलस्ते

  • जन्म -18 मई 1950
  • जन्म स्थान- बारबाती ,मंडला
  • पिता -श्री सोहन सिंह कुलस्ते
  • माता -श्रीमती हीरो बाई
  • 1989 में पहली बार यह मंडला से विधायक चुने गए।
  • मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता के रूप में मंडला लोकसभा से लगातार 6 बार जीत दर्ज की
  • 1999 से 2004 तक केंद्रीय संसदीय कार्य राज्यमंत्री का प्रभार संभाला ।
  • 2012 में इन्हें राज्यसभा सांसद के रूप में चुना गया ।
  • 2014 में इन्हें लोकसभा में पुनः जीत हासिल की।
  • यह 2016 से 2017 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री के रूप में कार्यरत रहे।
  • वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें इस्पात मंत्रालय में राज्य मंत्री का प्रभार दिया है।

दिलीप सिंह भूरिया

  • जन्म- 18 जून 1944
  • जन्म स्थान -झाबुआ
  • मृत्यु -24 जून 2015
  • यह अटल सरकार में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के अध्यक्ष रहे व भूरिया आयोग के भी अध्यक्ष रहे ।
  • पेैसा कानून जो आदिवासियों की सुरक्षा प्रदान करता है उसे बनाने का श्रेय से बनाने का दिलीप सिंह भूरिया को ही जाता है ।
  • दिलीप सिंह भूरिया आदिवासियों के राष्ट्रीय स्तर के नेता थे यह इंदिरा गांधी के भी करीबी थे ।
  • दिलीप सिंह भूरिया राष्ट्रीय मंच पर आदिवासी समाज को आगे बढ़ाने और उनके हित के लिए आवाज उठाते थे ।
  • दिलीप सिंह भूरिया अपने राजनैतिक जीवन में 6 बार सांसद रहे यह 7वीं, 8वीं, 9वीं ,10वीं ,11वीं ,12वीं लोकसभा में कांग्रेस से सांसद रहे परंतु 16वीं लोकसभा में यह भारतीय जनता पार्टी के सांसद के रूप में चुने गए।
  • 1980 में पहली बार सांसद बने थे उसके बाद लगातार 16 वर्ष तक सांसद के रूप में कार्यभार संभाला।
  • मोतीलाल वोरा के मुख्यमंत्री पद पर रहते दिलीप सिंह भूरिया के नेतृत्व में तेंदूपत्ता नीति बनाने के लिए भूरिया कमेटी बनाई गई थी जिस की अनुशंसा पर मध्य प्रदेश की तेंदूपत्ता नीति बनाकर लागू की गई थी ।
  • दिलीप सिंह भूरिया अखिल भारतीय सहकारी संघ के अध्यक्ष भी थे जिन्हें बोफोर्स घोटाले की प्रारंभिक जांच के लिए बनाई गई संसदीय कमेटी में भी सदस्य के रूप में चुना गया था।

कांतिलाल भूरिया

  • जन्म – 1 जून 1950
  • जन्म स्थान – झाबुआ
  • पिता का नाम – नानूराम भूरिया
  • माता का नाम – लादी बाई
  • इन्होंने एम ए व एल एल बी की शिक्षा चंद्रशेखर आजाद कॉलेज झाबुआ से किया है।
  • यह अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग और गरीब लोगों के लिए कार्य करने वाले राष्ट्रीय नेता के रूप में जाने जाते हैं।
  • कांतिलाल भूरिया 1998, 1999 और 2004 में झाबुआ निर्वाचन क्षेत्र से तथा 2009 और 2015 में रतलाम लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए ।
  • इन्हें मनमोहन सरकार 2009 में उपभोक्ता एवं खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय में कैबिनेट मंत्री के रूप में चुना गया।
  • वर्तमान में यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य हैं ।

नरेश चंद्र

  • यह छत्तीसगढ़ के बाईसगढ़ के राजा नरेश चंद्र शहर मध्य भारत में सारंगढ़ राज्य के शासक थे।
  • जिन्हें 1 जनवरी 1948 को भारत में अपने राज्य में विलय कर दिया।
  • नरेश सिंह एक भारतीय राजनेता के रूप में जाने जाते हैं और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं इनका कार्यकाल 13 से 25 मार्च 1969 तक रहा।
  • 1952 में पहला चुनाव जीतकर मध्य प्रदेश की पहली विधानसभा कैबिनेट के मंत्री बने।
  • नरेश चंद्र शाह दूसरी तीसरी एवं चौथी विधानसभा में भी सदस्य के रूप में कार्यरत रहे ।
  • कांग्रेस पार्टी के मतभेद के चलते इन्हें इन्होंने अपने पद से त्यागपत्र देकर राजनीति से संयास ले लिया।

गंजन सिंह कोरकू

  • जन्म स्थान – बैतूल जिले के घोड़ाडोंगरी ब्लॉक के छतरपुर गांव में
  • मृत्यु 1963
  • यह गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे।
  • 1930 में अंग्रेज सरकार ने गुंजन सिंह कूरको पर ₹500 का इनाम घोषित किया था।
  • गांधी जी के आह्वान पर घोड़ाडोंगरी बेतूल में 1930 में जंगल सत्याग्रह गुंजन सिंह कूरको के नेतृत्व में किया गया था इसी जंगल 17 सत्याग्रह में इनके करीबी साथी बंजारी सिंह कूरको को ने अपने प्राणों का बलिदान दिया।

हर्ष चौहान

  • हर्ष चौहान मूलतः धार जिले के निवासी हैं।
  • इनके द्वारा आदिवासियों के कल्याण के लिए झाबुआ एवं अलीराजपुर जिले में शिव गंगा प्रोजेक्ट (झाबुआ) एवं हलमां आंदोलन चलाया गया।
  • यह मूलतः भील जनजाति से आते हैं, इनके द्वारा मध्य प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र झाबुआ, अलीराजपुर, धार में जनजातियों के कल्याण के लिए विभिन्न कार्य किए गए हैं।
  • हर्ष चौहान  पेशे से इंजीनियर हैं, जिन्होंने अपनी प्रारंभिक उच्च शिक्षा SGSITS –  इंदौर से प्राप्त की तथा स्नातकोत्तर IIT-Delhi  से प्राप्त की, इसके पश्चात यह निरंतर जनजातीय कल्याण के क्षेत्र में कार्यरत हैं।
  • फरवरी 2021 में हर्ष चौहान राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।

This article is compiled by Supriya Kudraya.

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