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नारी जननी से लेकर विकास में सहायक

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” मैं हूं मानवता का गौरव, वात्सल्य का मापदंड,

सहिष्णुता की पराकाष्ठा,पुरुषों का पाखंड|

खेल का पर्याय, नई पीढ़ी का मार्गदर्शन,

प्रेम का सौभाग्य, तीन तलाक की उतरन||

नारी शब्द किसी परिभाषा का मोहताज नहीं, स्वयं में ही अनेक रूपों को समाहित किए हुए हैं|नारी की यात्रा मातृत्व की छाव व आंचल में शुरू होकर पत्नी ,माता, बहन, दादी, शिक्षक, पुत्री आदि से होकर निकलती है| नारी सिर्फ मातृत्व तक ही सीमित नहीं बल्कि सशक्त होकर राजनीति ,अर्थव्यवस्था आदि में भी योगदान व प्रतिनिधित्व रखती है|

” नारी पुरुष की संपत्ति नहीं, अर्धांगिनी,सहचरिणी है |”

                                  महात्मा गांधी
empowering women

प्राचीन काल से ही’ नारी ‘पूजनीय रही है |वैदिक काल में जहां समाज मातृसत्तात्मक था,वहां नारी के प्रति आदर ,सम्मान भी था| लोपामुद्रा ,गार्गी आदि नारी शक्ति साहित्य सृजन द्वारा विद्वान भी हुई|

मध्यकाल में अरबों व मुसलमानों के आक्रमण के फल स्वरूप नारी की दुर्दशा सामने दिखने लगी|यहां तक की अब नारी को घुंघट के नीचे छिपकर अपनी रक्षा करनी पड़ी |इसके बावजूद मध्यकाल में भी रजिया सुल्तान जैसे अपवाद रहे है| जिन्होंने नारी शक्ति को बढ़ाने का प्रयास किया|

आधुनिक काल में अंग्रेजों के समय भी नारियों की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ था |परंतु जीजाबाई ने वीर शिवाजी जैसे पुत्र भारतवर्ष को देकर मातृत्व को सर्वोपरि भी बनाया|

” माता सौ शिक्षकों के बराबर होती है इसलिए नारी का सदैव सम्मान होना चाहिए|”

माता को बालक की प्रथम गुरु कहा जाता है क्योंकि जब अवस्था से पूर्व ही बालक अपनी मां से जुड़ जाता है विद्यालय जाने के पूर्व तक बालक अपनी मां से ही सीखता है|

इसलिए शास्त्रों में कहा गया है-” मातृ देवो भव:|”

जैसे-जैसे परिवेश बदला वैसे -वैसे नारी की स्थिति में भी सुधार आया| राजा राममोहन राय जैसे लोगों ने सती प्रथा जैसी कुरीतियों को समाप्त करने हेतु प्रयास किए|

संविधान निर्माण के समय से ही नारी शक्ति सशक्त होने लगी |संविधान सभा में 15 महिला सदस्य थी| उस समय से अब तक लोक सेवा में महिला सांसदों की 78 तक पहुंच गई है|

” तु विद्या  तू शक्ति ,भक्ति तू अनंत रूप

 तू धरती तू अंबर, तू जननी तू विश्वरूप

भरना है ऊंची उड़ान……….

 नारी तू खुद को पहचान………”

आज संगीत, कला, साहित्य ,खेल विज्ञान, शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष, हर क्षेत्र में नारी शक्ति एक सुदृढ़ नेतृत्व के रूप में उभर रही है |जो कि भारत के निर्माण में सहायक भूमिका होगी|

कहा जाता है –

“दस पुरुषों को शिक्षित करने की बजाय एक नारी को शिक्षित कीजिए वह पूरे परिवार को शिक्षित कर देगी|”

आज खेल में तो महिलाओं ने पदक की दौड़ में पुरुषों को भी पीछे छोड़ दिया| हाल ही में मैरी कॉम ,पीवी सिंधु हिमा दास आदि महिलाओं ने विश्व स्तर पर भारत का लोहा मनवाया

इतना ही नहीं अंतरिक्ष क्षेत्र में भी भूमिका सराहनीय है| जैसे कि 2019 में भेजे गए चंद्रयान-2 अंतरिक्ष मिशन की प्रोजेक्ट निर्देशक वह मिशन निर्देशक महिलाएं ही थी| साथ में पूरे समूह में 30% महिला वैज्ञानिकों की सहभागिता की गई|

 

” अंतरिक्ष को जिसने छू लिया,         कल्पना थी बेटी इस देश की |

हिम् पर लहराया तिरंगा ,

बछेन्द्री बेटी इस देश की |

खेल हो या की विज्ञान, नारी को अपनी पहचान|”

इसी प्रकार नारी शक्ति विदेशों में अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में मुख्य पदों पर विश्व का प्रतिनिधित्व कर रही है |गीता गोपीनाथ ,क्रिस्टीना लेगार्ड ,विजया लक्ष्मी पंडित आदि कई उदाहरण है| भारत की जनसंख्या की ओर देखे तो यहां लगभग आधी आबादी महिलाओं की है परंतु क्या वास्तविकता में भी वे उतनी अर्थव्यवस्था की भी भागीदारी है????

वर्तमान परिपेक्ष्य का यह सबसे कटु प्रश्न है |पुरुष प्रधान सोचने रूढ़िवादिता से ग्रस्त समाज में नारी को हजारों बार आगे बढ़ने से रोका| परंतु अब नारी जागरूक हो रही है शिक्षा स्वास्थ जैसे सुविधाओं से वह| भी जनांकिकी की लाभांश में अपना सहयोग दे रही है |

सुकन्या समृद्धि योजना, मुख्यमंत्री कन्यादान योजना ,बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ ,गांव की बेटी योजना आदि योजनाओं से महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक स्थिति में भी सुधार हुआ|

राजा राममोहन राय ने कहा था_

” नारी को आर्थिक रूप से सशक्त करके ही चारदीवारी से चौराहे तक लाया जा सकता है |”

हमारा संविधान भी नारी को समान अधिकार अनुच्छेद 14 ,15 (1),15 (2), 16 (2), 39( क), अनुच्छेद 42 अनुच्छेद 51 (क )(e ) भी नारी के सम्मान की बात करते हैं| अधोलिखित अनुच्छेदों में समानता, आरक्षण, प्रसूति सहायता ,समान वेतन आदि के अधिकार दिए गए हैं|

इसके अतिरिक्त भारतीय संहिता की धारा 375, 376, 495 आदि धाराएं महिलाओं को संरक्षण देती हैं| पंचायती राज में भी 50% आरक्षण दिया गया है |इसके साथ ही दहेज प्रथा निवारण अधिनियम 1961 ,घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 ,समान वेतन (न्यूनतम मजदूरी अधिनियम ),यौन शोषण से संरक्षण अधिनियम 2012 आदि कई प्रयास सराहनीय रहे हैं|

परंतु श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार- “भारत में 40% महिलाओं को समान मजदूरी करने के बाद भी वेतन भत्ता समान नहीं मिलता|”

गीता जी मैं  कहा गया है –

“यत्र नार्यस्तु पूज्यंते ,रमंते तत्र देवता:

यत्रैतास्तु ना पूज्यन्ते, सर्वास्त त्राफला क्रिया:||”

 

अर्थात नारी हर स्थान पर पूजनीय है है वह भले ही शक्ति के रूप में ,हो या लक्ष्मी के रूप में, यज्ञ हवनों में, अर्धांगिनी हो या आगन की किलकारी के रूप में,

नारी पर्यटन के क्षेत्र में विकास का सबसे अच्छा लाभांश हो सकती है| क्योंकि नारी मैं समझने का गुण बहुत अच्छा होता है |पाककला अचार- विचार से नारी पर्यटकों को आकर्षित कर सकती है| इससे भी विकास की भागीदारी भी बनेगी और आत्मनिर्भर भी

इसी तरह कुटीर उद्योग( पापड़, अचार आदि बनाना) पाक कला, संगीत ,कला ,शिक्षा में नारी शक्ति की सहभागिता अर्थव्यवस्था को गति देती है|

यह सत्य है कि नारी में पुरुषों की अपेक्षा अधिक कार्य क्षमता

होती है सहनशीलता में तो उनका कोई विकल्प ही नहीं है|

वर्ल्ड इकनोमिक फोरम की एक रिपोर्ट में कहा गया था -“किसी कार्य स्थल पर महिलाओं की भागीदारी 25% तक बढ़ाने से कार्य दक्षता 40% तक बढ़ जाती हैं|”

इस प्रकार नारी की सहनसा की कोई सीमा ही नहीं है |परंतु इन सब उदाहरणों के बावजूद घटता  लिंगानुपात ,मातृ मृत्यु दर आदि भारतीय समाज पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं |स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण महिलाओं की मृत्यु अधिक देखी जाती है|

इतना ही नहीं कार्यस्थल पर यौन शोषण, एसिड अटैक, बलात्कार, मानव तस्करी जैसी कुरीतियां आज भी महिला सशक्तिकरण में बाधक है|

इस हेतु किए गए  सरकारी प्रयास सराहनीय रहे हैं-

– प्रधानमंत्री मातृत्व योजना -आयुष्मान भारत योजना

– जननी सुरक्षा योजना

– निर्भया कोष

-metooअभियान

– अनैतिक व्यापार निषेध अधिनियम

-विशाखा गाइडलाइन आदि

नारी को सशक्त करने हे तू पहले सोच में परिवर्तन अति आवश्यक है तभी ये नारी देश -विदेश में विकास की भागीदारी बन सकेगी|

” एसिड की चंद बूंदे क्या रोकेंगे उसकी राह

सृष्टि ,समाज को रचा  है उसने हाथों से

पुरुष क्या करेगा, नारी को गुमराह|”

कवियों ने भी नारी के सम्मान की बात कही है |उन्होंने काव्य रचना से नारी को संदेश दिए हैं| परंतु नारी से इतनी अपेक्षा करना, सदैव उसी ही मापदंडों पर तौलना _स्वच्छ समाज की सोच नहीं बताता इसलिए आवश्यक है कि नारी को नारी ही रहने दें |भगवान तुल्य मानकर उसकी अस्मिता को न  परखे|

“हर युग में उसकी परीक्षा ली जाती है,

वो सीता बनकर अग्नि में समा जाती है ,

कभी सती तो कभी सावित्री बन जाती है,

वो नारी है ,कोई माटी का खिलौना नहीं ,

जो हर रूप में ढल जाती है|”

This article is written by Arti Parmar.

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