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चार्वाकों की नीति मीमांसा

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चार्वाकों की नीतिमीमांसा

चार्वाक संप्रदाय जिस मूल सिद्धांत को आधार मानकर चली है, वह है सुखवाद (Hedoism) सुखवाद का सरल अर्थ है, कि सुखों की प्राप्ति करना ही नैतिक कर्म है। हमारे जो भी कार्य सुख प्रदान करते हैं, वे नैतिक हैं, और दुख प्रदान करने वाले कार्य हैं वे अनैतिक है। भारतीय दर्शन के नौ संप्रदायों में से चार्वाक अकेला है जो सुखवाद के पक्ष में खड़ा है। शेष लगभग सभी संप्रदाय लौकिक सुखों को निंदा की भाव से देखते हैं और उन्हें अवांछनीय घोषित करते हैं।

चार्वाक संप्रदाय का स्पष्ट मत है कि जब तक जियो सुख से जियो, उधार लेकर घी पियो, एक बार देह भस्म हो जाने के बाद वापस कोई लौटकर नहीं आता है। चार्वाकों ने सुखभोग के संबंध में कुछ स्पष्ट सिद्धांत भी बताए हैं। इनका पहला सिद्धांत है कि भविष्य की अनिश्चित सुख की बजाय वर्तमान के निश्चित सुख का भोग किया जाना चाहिये दूसरा सिद्धांत है कि कोई भी सुख पूर्णतः शुद्ध नहीं होता, उसमें किसी-न-किसी मात्रा में दुख भी शामिल होता है। किंतु, उस छोटेमोटे दुख से डरकर सुख की कामना छोड़ना निरर्थक है। उदाहरण के लिये मछली खाना इसलिये नहीं छोड़ना चाहिये कि उसमें काँटा होता है।

चार्वाक पूर्णतः भौतिकवादी थे, वे पारलौकिक सत्ता को स्वीकार नहीं करते। उनका दावा है कि आत्मा नामक कोई वस्तु नहीं होती है। उन्होंने व्यंग्य में कहा है कि मृत्यु के अलावा कोई मोक्ष नहीं है।

चार्वाक नीति के सकारात्मक पक्ष

चार्वाक नैतिकता पूरी तरह से इहलोकवाद पर टिकी है। इहलोकवाद का अर्थ है कि यह जगत ही अंतिम सत्य है। नैतिकता के संदर्भ में इसका अर्थ है कि हमें अपने नैतिक सिद्धांतों का निर्धारण लौकिक जीवन के आधार पर करना चाहिये, उसके लिये आलौकिक या पारलौकिक संदर्भ को आधार नहीं बनाना चाहिये।

चार्वाक नीति का दूसरा सकारात्मक पहलू यह है कि वह मानव सहजता का सम्मान करती है। उदाहरण के लिये सांख्य, जैन, न्याय, वैशेषिक तथा अद्वैत सभी दर्शन मनुष्य को सलाह देते हैं कि वे सांसारिक सुखों से यथासंभव दूरी बनाए रखें। चार्वाक इस मामले में भारतीय दार्शनिक परंपरा का अकेला अपवाद है। सांसारिक जीवन को सहज रूप में स्वीकार करता है। वह सुखों और दुखों को जीवन के सहज हिस्सों के तौर पर देखता है।

चार्वाक दर्शन की अन्य उपयोगी बात यह है कि वह व्यक्ति को अतीत या भविष्य की चिंताओं में डूबने की बजाय वर्तमान में जीने की सलाह देता है। कुछ लोग भविष्य में कुछ अच्छा हासिल करने की होड़ में वर्तमान को अनावश्यक रूप से बोझिल बना लेते हैं। आजकल कई मनोवैज्ञानिक सलाह देते हैं कि जहाँ तक संभव हो, व्यक्ति को अतीत की चिंताओं और भविष्य की योजनाओं से बचते हुए वर्तमान को अच्छे तरीके से जीने पर फोकस करना चाहिये।

चार्वाक नीति के नकारात्मक पक्ष

चार्वाक नीति की कुछ अच्छी बातों के बावजूद सच यही है कि वह कई मायनों में समाज के लिये न केवल अप्रासंगिक है, बल्कि कई बिंदुओं पर घातक भी हो जाता है।

चार्वाकों के नैतिक सिद्धांत में दूसरी बड़ी कमी यह है कि वे सिर्फ व्यक्ति के सुखों की बात करते हैं, समाज के सुखों की नहीं। यह बात मोटे तौर पर सही है कि संसार का हर व्यक्ति अपने लिये अधिकतम सुख चाहता है, पर यह भी उतना ही सही है कि अगर सभी व्यक्ति बिना किसी नैतिक नियमन के अंधाधुंध तरीके से सुखों की होड़ में लग जाएँ तो उनके बीच आपस में ही इतने संघर्ष हो जाएंगे कि अधिकांश के हिस्से में दुख आएगा।

चार्वाकों के नैतिक दर्शन की तीसरी कमी यह है कि वह अतिवाद के स्तर को छूता है। वैदिक परंपरा के सिद्धांतों का विरोध करतेकरते चार्वाक एक दूसरे छोर पर पहुँच जाते हैं और खुद भी एक तरह के रुढ़िवादी के शिकार हो जाते हैं। उदाहरण के लिये, जब वे कहते हैं कि ‘काम एकमात्र पुरुषार्थ है’ तो वे काम को इतना महिमामंडित कर देते हैं कि जैसे उसके अलावा जीवन में कुछ है ही नहीं।

This article is compiled by Sarvesh Nagar (NET/JRF).

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